SCF-7F, Sector-27-C, Chandigarh
9779200432 , 9041414411 (Whatsapp)
Helpline: 0172-5015432
iiachandigarh@gmail.com

फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी तिथि भारतवर्ष में “महाशिवरात्रि”महापर्व के रूप में मनाई जाती है इस दिन उपवास एवं रात्रि जागरण का अधिक महत्त्व है अतः प्रातः काल अन्तः-बाह्य शोअच से निवृत्त हो कर भगवान् शिव भक्ति प्राप्ति हेतु आत्म कल्याण हेतु व्रत का संकल्प लें एवं चार प्रहर पूजा करें पहले प्रहर पंचोपचार पूजन के बाद दूध से अभिषेक करें इसी प्रकार हर प्रहर में करमशय दहीं.शहद एवं घी से अभिषेक करें पूजन आरती हर प्रहर में करें “पंचाक्षरी मन्त्र “ ॐ नमः शिवायः” का अधिक से अधिक जाप करें रात्रि जागरण करें !अगले दिन प्रातः विभिन्न नैवेद्यों युक्त आरती कर पितरों को जल तर्पण से संतुष्ट कर व्रत का पारना करें!

    “रहस्य” शिव लिंग साकार होते हुए भी निराकार मूर्त है क्यूंकि श्री दुर्गा सप्तशती के प्राधानिक्म रहस्य के अनुसार सर्प एवं अर्ध चन्द्र युक्त योनिलिंग को माँ पराशक्ति अपने मस्तक पर धारण किये रहती हैं वहां पर सर्प काल का एवं चंद्रमा शांति का लिंग निराकार पराशक्ति का एवं योनी प्रकृति के स्वरूप समझ आते हैं ऐसा मेरा अनुभव भी है “ईशान” संहिता के अनुसार पद्म कल्प के प्रारंभ में भगवान् ब्रह्मा जी ने घूमते हुए शेष शय्या पर विराजित भगवान् विष्णु को योग्निन्द्रामें स्थित देखा उनके वैभव को देख कर दैव वश उन्हें विचार आया की श्रृष्टि का निर्माता मैं हूँ तो ये व्यर्थ में आराम कर रहे हैं अहंकार वश उनका ज्ञान लोप हो गया और इसी कारण से भगवान् विष्णु अपने आयुध “महेश्वर” एवं ब्रह्मा जी “पाशुपत” अस्त्र के द्वारा युध्ह के लिए उद्द्वत्त हुए अनिष्ट की आकांक्षा को देखते हुए देवता भगवान् शिव के पास सहायता के लिए गये परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए सर्वेश्वर भगवान् सदाशिव ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रक्षा हेतु अपने मूल स्वरूप परात्पर इश्वर को “लिंग” के रूप में दोनों के मध्य प्रगट किया जिसके कारण दोनों महा अस्त्र शांत होकर उसी लिंग में समाहित हो गये इस स्थिति को देख कर ब्रह्मा जी एवं विष्णु जी ने इस प्रादुर्भाव को नापने की कोशिश की असमर्थ होने की स्थिति में दोनों पुरुषों नें इस लिंग रुपी परात्पर इश्वर की पूजा की इस लिंग का प्राकट्य फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को हुआ था इस लिए इस दिन शिवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है. !!पुराणों के अनुसार और भी कई कथाएँ वर्णित हैं परन्तु मूल प्राकट्य कथा “ईशान संहिता” में ही मिलती है !! जय भोले नाथ !! ज्योतिष शास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि (जिसके देवता स्वयम शिव मानें जाते हैं” में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है अतः वोही समय जीवन रुपी चंद्रमा का शिव (चेतन)रुपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है !! भगवान् शंकर संहार शक्ति एवं तमोंगुण के अधिष्टाता हैं तमोमयी रात्रि उन्हें प्रिय है अतः ये पर्व रात्रि प्रधान है !! अतः

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्ये देहिनः एवं या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी!!(गीता २/५९-६९)

डॉ.बलविन्द्र अग्रवाल